पांचवां कारावास : 19 अक्टूबर 1930-26 जनवरी 1931

Fifth Imprisonment, Jawaharlal Nehru in Naini Central Prison
Jawaharlal Nehru in Naini Central Prison

11 अक्टूबर 1930 को जेल से रिहा होते ही जवाहरलाल नेहरू कर-बंदी आंदोलन में सक्रिय हो गए। 12 अक्टूबर 1930 को एक अपार जन-सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा -

‘‘....हमने अहिंसा का मार्ग अपनाया है क्योंकि हमारा इसी में विश्वास है तथा हम इसकी पूर्ण निष्ठा से परीक्षण करने की इच्छा रखते हैं....। इस महान संघर्ष के प्रथम चरण का अंत आ गया है। यह राष्ट्रीय जागरुकता के लिए उल्लेखनीय है जिसका समस्त विश्व प्रशंसापूर्ण साक्षी रहा है।

अब दूसरा चरण प्रारंभ हो रहा है, स्वतंत्र भारत के भविष्य की नींव का चरण। इस प्रयास में प्रत्येक शहर, प्रत्येक मोहल्ला, प्रत्येक गांव अपनी भूमिका अवश्य निभाए जिससे कि स्वतंत्र भारत में उनका जीवन स्वावलंबी अस्तित्व के लिए तैयार हो सके। हमें किसी प्रकार के कर की अदायगी नहीं करनी हैं। हमें ब्रिटिश सरकार को न केवल कोई कर न देने के लिए अपितु उनके द्वारा प्रतिपादित सेवा को न करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।’’

उन्हें 19 अक्टूबर 1930 को किसानों में कर-बंदी आंदोलन के सक्रिय प्रचार के लिए बंदी बना लिया गया। न्यायाधीश जे. एस. ग्रोस द्वारा 24 अक्टूबर 1930 को उन पर मुकदमा चलाया गया। मुकदमे के दौरान नेहरू ने कहा :

‘‘....आज़ादी एवं दासता तथा झूठ एवं सच्चाई में कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। हम जान चुके हैं कि स्वतंत्रता की कीमत खून व कष्ट है - अपने देशवासियों का खून तथा इस भूमि के श्रेष्ठजनों का कष्ट-और यह कीमत हम पूर्ण रूप से चुकाएंगे...।

मैं भारतवासियों के इस विश्वास एवं प्रेम के लिए पर्याप्त रूप से अपनी कृतज्ञता भी प्रकट नहीं कर सकता। इस शानदार संघर्ष में सेवा करने तथा इसके लिए मेरा थोड़ा सा भी योगदान, मेरे जीवन की असीम खुशी है। मैं प्रार्थना करता हूं कि मेरे देश का प्रत्येक नर-नारी अनवरत रूप से इस संघर्ष को तब तक जारी रखेंगे जब तक कि उनके प्रयास सफल नहीं होते और हमारे सपनों का भारत साकार नहीं हो जाता। स्वतंत्र भारत अमर रहे!’’

उन्हें राजद्रोह के मामले में धारा 124ए के अंतर्गत 18 मास के कठोर कारावास के साथ 500 रुपए का जुर्माना; नमक कानून 1882 के अंतर्गत 6 महीने का कारावास के साथ 100 रुपए का जुर्माना; तथा 1930 के अध्यादेश VI के अंतर्गत भी 6 महीने का कारावास तथा 100 रुपए का जुर्माना दिया गया। जैसाकि आखिर के दो मामले समवर्ती थे, इस कारण पूर्ण कारावास दो वर्ष का कठोर कारावास, तथा इसके साथ जुर्माना नहीं देने पर 5 महीने का अतिरिक्त कारावास, निश्चित किया गया।

जवाहरलाल नेहरू ने नैनी सेंट्रल जेल में 97 से अधिक दिन व्यतीत किए तथा उन्हें 26 जनवरी 1931 को रिहा कर दिया गया। जब वे कारावास में थे उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा को पत्र लिखने की एक श्रृंखला की शुरूआत की जो बाद में, 1934 में, विश्व इतिहास की झलक के नाम से प्रकाशित हुई।

Back to Top